A Review Of Hindi poetry
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कोई भी हो शेख नमाज़ी य